शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

hum tumse juda hoke

बुधवार, 18 अगस्त 2010

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

रविवार, 15 अगस्त 2010

accha sila diya tunne

Ab Ke Baras - Kranti

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

Arpan - Mohabbat Ab Tijarat Ban Gayi Hai

Aarti Utaro Krishna Ke... Sanskar TV

बुधवार, 11 अगस्त 2010

Chala bhi aa,MAN KI AANKHEN

Is reshmi pazeb ki,LAILA MAJNU

Mujhe Chhu Rahi Hai - Swayamvar

सोमवार, 9 अगस्त 2010

रविवार, 8 अगस्त 2010

1981 Dard - Pyar Ka Dard Hai Meetha Meetha Pyara Pyara

“प्‍यार गुनाह है तो होने ना देना
प्‍यार खुदा है तो खोने ना देना
करते हो प्‍यार जब किसी से तो
कभी उस प्‍यार को रोने ना देना

शनिवार, 7 अगस्त 2010

Shor Mach Gaya Shor - musicworldofindia.com

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

banke bihari

Do Panchi Do Tinke - Tapasya (1976)

TEZ NEWS

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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

Simiti hue yeh ghadiyan- Chambal Ki Kasam

Simiti hue yeh ghadiyan- Chambal Ki Kasam

बारमेर न्यूज़ track


आज भी कायम पगड़ी की शान राजस्‍थान में

: राजस्थान की समृद्ध संस्कृति एवं रीति-रिवाज आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में खोते जा रहे हैं। आधुनिकता और पाश्चात्य सभ्यता के साथ आये बदलाव ने परम्परागत रीति-रिवाजों को न केवल बदलकर रख दिया, अपितु राजस्थान की समृद्ध संस्कृति अपना आकार खोती जा रही हैं।रोजमर्रा की भागदौड़ और पहियों पर घूमती वातानुकूलित जिन्दगी के बीच समारोह के दौरान साफा उपलब्ध नहीं होने अथवा इस ओर किसी का ध्यान आकृष्‍ट नहीं होने पर ऐसे मौके पर इसका प्रबन्ध नहीं हो पाता है। चुनिन्दा स्थानों से साफा लाने की जहमत कोई नहीं करता, लेकिन साफे का स्थान बरकरार है। इस स्थान को बदला नहीं जा सकता। दुनिया के कानून, संविधान तो बदले जा सकते हैं। मगर ‘साफे’ का स्थान नहीं बदला जा सकता। इसका महत्व इसी कारण बरकरार हैं। विभिन्न समारोहों में अतिथियों का साफा पहनाकर स्वागत करने की परम्परा है। ‘साफा’ राजस्थान की समृद्ध संस्कृति और परम्परा का अभिन्न हिस्सा हैं। लेकिन, राजपूती आन-बान-शान का प्रतीक साफा अब सिरों से सरकता जा रहा है। युवा पीढ़ी आधुनिक होकर ‘साफे’ का महत्व समझ नहीं पा रही है। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ‘पाग-पगड़ी-साफे’ को इज्जत और ओहदे का प्रतीक माना जाता है। साफे को आदमी के ओहदे व खानदान से जोड़कर देखा जाता हैं। साफा पहन कर बड़े-बुजुर्ग अपने आपको सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मालिक समझते हैं। ‘साफा’ व्यक्ति के समाज का प्रतीक माना जाता हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अलग-अलग समाज में अलग-अलग तरह के साफे पहने जाते हैं। साफे से व्यक्ति की जाति व समाज का स्वतः पता चल जाता हैं। ‘पगड़ी’ आदमी के व्यक्तित्व की निशानी समझी जाती है। ‘पगड़ी’ की खातिर आदमी स्वयं बरबाद हो जाता है, मगर उस पर आंच नहीं आने देता। ‘साफा’ ग्रामीण क्षेत्रों में सदा ही बांधा जाता है। खुशी और गम के अवसरों पर भी ‘साफे’ का रंग व आकार बदल जाता हैं। खुशी के समय रंगीन साफे पहने जाते हैं। जैसे शादी-विवाह, सगाई या अन्य उत्सवों, त्यौहारों पर विभिन्न रंगो के साफे पहने जाते हैं। मगर, गम के अवसर पर खाकी अथवा सफेद रंग के साफे पहने जाते हैं, ये शोक का प्रतीक होते हैं। हालांकि, मुस्लिम समाज (सिन्धी) में सफेद साफे शौक से पहने जाते हैं। सिन्धी मुसलमान सफेद ‘पाग’ का ही प्रयोग करते हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी मनमुटाव, लडाई-झगडों का निपटारा ‘साफा’ पहनकर किया जाता है। जैसलमेर व बाड़मेर जिलों के कई गांवो में आज भी अनजान व्यक्ति अथवा मेहमानों को ‘नंगे’ सिर आने की इजाजत नहीं हैं। राजपूत बहुल गांवों में साफे का अत्यधिक महत्व है। इन गांवो में सामंतशाहों के आगे अनुसूचित जाति, जनजाति (मेघवाल, भील आदि) के लोग साफा नहीं पहनते, अपितु सिर पर तेमल (लूंगी) अथवा टवाल बांधते हैं। इनके द्वारा सिर पर पगड़ी न बांधने का मुख्य कारण ‘ठाकुरों या सामन्त’ के बराबरी न करना है। विवाह, सगाई अथवा अन्य समारोह में साफे के प्रति परम्पराओं में तेजी से गिरावट आई है। अभिजात्य परिवारों में साफा आज भी ‘स्टेटस सिम्बल’ बना हुआ हैं। अभिजात्य वर्ग में साफे के प्रति मोह बढ़ता जा रहा है। शादी विवाह या अन्य समारोह में ‘साफे’ के प्रति छोटे-बड़ों का लगाव आसानी से देखा जा सकता है।हाथों से बांधने वाले ‘साफे’ का जवाब नहीं होता। हाथों से साफे को बांधना एक हुनर व कला है। इस कला को जिंदा रखने वाले कुछ लोग ही बचे हैं। आजकल चुनरी के साफों का अधिक प्रचलन है। लहरियां साफा भी प्रचलन में है। मलमल, जरी, तोता, परी कलर के साफे भी पसन्द किए जा रहे हैं। जोधपुरी साफा पहनना युवा पसन्द करते हैं, जबकि बड़े-बुजुर्ग जैसलमेरी साफा, जो गोल होता है, पहनना पसन्द करते हैं। केसरिया रंग का गोल साफा पहनने का प्रचलन अधिका हैं। बहरहाल, साफे का महत्व आज भी कायम हैं।

रविवार, 1 अगस्त 2010

पोलिथीन की शव यात्रा निकाली














बाडमेर। राज्य सरकार ने अघिसूचना जारी कर जिले में एक अगस्त, 2010 से प्लास्टिक कैरी बैग के विनिर्माण, भण्डारण, आयात, विक्रय एवं परिवहन को पूर्ण रूप से प्रतिबन्घित कर दिया है। जिला मुख्यालय पर गांधी चौक से डाक बंगले तक रविवार को पोलिथीन की शव यात्रा निकाली जिसमें जिले के जिला कलक्टर गौरव गोयल, प्रभारी मंत्री पुलिस अधीक्षक सन्तोष चालके, मुख्य कार्यकारी अघिकारी रामावतार मीणा, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अघिकारी चूनाराम विश्नोई, उपखण्ड अघिकारी सी.आर.देवासी, बाडमेर नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती उषा जैन, बालोतरा महेश चौहान समेत व्यापार मण्डलों के प्रतिनिघि, जन प्रतिनिघि तथा संबंघित अघिकारी उपस्थित थे। जिले में इसके प्रति जन जागरण के लिए जागरूकता रैलियां निकाली ।
जिला कलक्टर गौरव गोयल ने बताया कि एक अगस्त से जिले में कोई भी व्यक्ति, दुकानदार, विक्रेता, थोक विक्रेता, फुटकर विक्रेता, व्यापारी आदि बेचेने के लिए प्लास्टिक के कैरी बैग का उपयोग नहीं करेगा। उन्होंने बताया कि एक अगस्त से प्रभावी होने वाली इस अघिसूचना का उल्लंघन करने पर पर्यावरण संरक्षण अघिनियम 1986 के तहत पांच वष्ा का कारावास या एक लाख रूपए का जुर्माना या दोनो सजाओं से दण्डित किया जाएगा।
साथ ही यदि अघिसूचना का निरन्तर उल्लंघन किया जाता है तो उल्लंघनकर्ता को पांच हजार रूपए प्रतिदिन तक के अतिरिक्त जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बाडमेर तथा बालोतरा समेत सभी तहसील मुख्यालयों पर अघिसूचना की ठोस पालना के लिए 24 उडन दस्तों का गठन किया गया है जो उन्हें आंवटित क्षेत्रों मे एक से सात अगस्त तक प्लास्टिक कैरी बेग के प्रतिबन्ध पर पूर्ण निगरानी रखेंगे।